The space is inside the cylinder but outside the cone is 200π cubic FT or 628.32 cubic FT.
<h3>What is a cone?</h3>
It is defined as the three-dimensional shape in which the base is a circular shape and if we go from circular base to top the diameter of the circle reduces and at the vertex, it becomes almost zero.
We know the volume of the cylinder is given:

r = 10/2 = 5 FT
h = 12 FT

V = 300π cubic FT
Volume of the cone:


v = 100π cubic FT
Space is inside the cylinder but outside the cone = 300π - 100π
= 200π cubic FT
= 628.32 cubic FT
Thus, the space is inside the cylinder but outside the cone is 200π cubic FT or 628.32 cubic FT.
Learn more about the cone here:
brainly.com/question/16394302
#SPJ1
the volume of cylinder is volume of cylinder is for
Answer:
9 and 11
Step-by-step explanation:
So let's say that the first integer is x.
That means that the second integer is x+2, since it us the next odd number.
This problem can be easily solved with our mind the answer is 9 and 11, but I'll show you the steps to slove this.
We make an equation using these two numbers:

Now all we gotta do is solve for x:

Now we use either splitting the middle term or quadratic formula:

Now we split each terma and solve for x:

Now the question states <em>positive </em>so we can rule out x = -11.
Now we have the first integer x = 9,
the second integer is x+2 = 9+2 =11
So the two consecutive positive odd integers are 9 and 11
Answer:
hope it helps
please mark me brainliest
Step-by-step explanation:
वात्सल्य रस का स्थायी भाव है। माता-पिता का अपने पुत्रादि पर जो नैसर्गिक स्नेह होता है, उसे ‘वात्सल्य’ कहते हैं। मैकडुगल आदि मनस्तत्त्वविदों ने वात्सल्य को प्रधान, मौलिक भावों में परिगणित किया है, व्यावहारिक अनुभव भी यह बताता है कि अपत्य-स्नेह दाम्पत्य रस से थोड़ी ही कम प्रभविष्णुतावाला मनोभाव है।
संस्कृत के प्राचीन आचार्यों ने देवादिविषयक रति को केवल ‘भाव’ ठहराया है तथा वात्सल्य को इसी प्रकार की ‘रति’ माना है, जो स्थायी भाव के तुल्य, उनकी दृष्टि में चवर्णीय नहीं है[1]।
सोमेश्वर भक्ति एवं वात्सल्य को ‘रति’ के ही विशेष रूप मानते हैं - ‘स्नेहो भक्तिर्वात्सल्यमिति रतेरेव विशेष:’, लेकिन अपत्य-स्नेह की उत्कटता, आस्वादनीयता, पुरुषार्थोपयोगिता इत्यादि गुणों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि वात्सल्य एक स्वतंत्र प्रधान भाव है, जो स्थायी ही समझा जाना चाहिए।
भोज इत्यादि कतिपय आचार्यों ने इसकी सत्ता का प्राधान्य स्वीकार किया है।
विश्वनाथ ने प्रस्फुट चमत्कार के कारण वत्सल रस का स्वतंत्र अस्तित्व निरूपित कर ‘वत्सलता-स्नेह’ [2] को इसका स्थायी भाव स्पष्ट रूप से माना है - ‘स्थायी वत्सलता-स्नेह: पुत्राथालम्बनं मतम्’।[3]
हर्ष, गर्व, आवेग, अनिष्ट की आशंका इत्यादि वात्सल्य के व्यभिचारी भाव हैं।